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बेतिया(प.चं.) :: टकराव का रास्ता छोड़कर शिक्षकों की जायज मांगों को स्वीकार करे सरकार : प्रो रणजीत
February 19, 2020 • aaditya prakash srivastava • राजनीति

शहाबुद्दीन अहमद, बेतिया(प.चं.), बिहार। बिहार शिक्षा मंच के संयोजक एवम सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के भावी प्रत्याशी प्रो रणजीत कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर माँग किया है कि सरकार टकराव एवम दमन का मार्ग छोड़कर नियोजित शिक्षकों की जायज माँगो समान काम,समान वेतन एवम समान सेवा शर्त को स्वीकार कर गतिरोध को समाप्त किया जाए। प्रो कुमार ने पत्र में  आगे लिखा है कि बिहार के तीन लाख से अधिक शिक्षक 17 फरवरी से अनिश्चित कालीन हड़ताल पर चले गए हैं।राज्य के 72 हजार विद्यालयों में तालाबंदी की स्थिति है।25 फरवरी से उच्च विद्यालयों के शिक्षक भी  अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जा रहे हैं।सरकार की ओर से भी दमनात्मक कार्रवाई हेतु लगातार निर्देश पत्र जारी किए जा रहे हैं। पूरी तरह से टकराव के हालात बन गए हैं।पठन पाठन बाधित है। शिक्षक राजनीति को व्यवसाय बनाने वाले नेताओं की मिलीभगत से सरकार ने 2006 में स्थायी पदों को समाप्त करने का निर्णय लिया और नियोजन के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति होने लगी लेकिन नियोजित शिक्षकों के लिए जो सेवा नियमावली बनी, वह पूरी तरह से एकपक्षीय, अपमानजनक एवम शिक्षक विरोधी है। नियोजित शिक्षकों को पुराने शिक्षकों को मिल रही तमाम अधिकारों एवम सुविधाओं से महरूम रखा गया।वेतनमान, पेंशन,सेवांत लाभ सावधिक प्रोन्नति, अंतरजिला स्थानांतरण,राज्यकर्मी का दर्जा आदि तो दूर की कौड़ी है,13 साल गुजर जाने के बाद भी नियोजित शिक्षकों को मामूली भविष्य निधि कटौती की भी सुविधा उपलब्ध नहीं है। भविष्य निधि कटौती करने संबंधी पटना उच्च न्यायालय के निर्णय को सरकार अब तक लागू करने में नाकाम साबित हुई है। विडंबना तो यह है कि उच्च विद्यालयों में कार्यरत वेतनमान वाले लिपिक एवम अनुसेवक से भी  नियोजित शिक्षकों का वेतन कम है।इस तरह की सेवा शर्त एवम अपमानजनक परिस्थिति में शिक्षकों से अपना सर्वश्रेष्ठ देने की अपेक्षा करना आकाश सुमन  की तरह है।सरकार ने संस्कृत एवम मदरसा के शिक्षकों को वेतनमान देकर काबिलेतारीफ काम किया है लेकिन सरकारी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों के साथ नाइंसाफी एवम भेदभाव क्यों ? प्रो कुमार ने लिखा है कि समान काम समान वेतन के मसले पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर शिक्षकों का वेतन 20 % बढ़ाने की बात कही लेकिन एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद सरकार ने अपना वायदा नही निभाया।सर्वशिक्षा अभियान के तहत सरकार 2006 से प्रत्येक शिक्षक के वेतन मद में 37500/-उठाती रही है और शिक्षकों को बहुत कम राशि वेतन मद में भुगतान करती रही है। शिक्षकों के वेतन मद की राशि काटकर सरकार साइकिल -पोशाक योजना चला रही है। एक सुनियोजित रणनीति के तहत शिक्षकों के मनोबल को तोड़ने का अभियान चलाया जा रहा है ताकि  शिक्षक एकजुट होकर अपने हक हकूक के लिये मजबूती से संघर्ष ही न कर सके। एक साजिश के तहत फर्जी पत्रकार फर्जी शिक्षक से सवाल जवाब करते हैं और फिर शिक्षकों को अल्पज्ञानी एवम नकारा साबित करने संबंधी वीडियो सोशल मीडिया पर डालकर शिक्षक समाज की जगहँसाई कराते हैं। शिक्षकों के साथ इस तरह का व्यवहार अक्षम्य है। विदित हो कि  न्याय के साथ विकास की यात्रा में शिक्षक बहुत पीछे छूट गए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार के एजेंडे में शिक्षा और शिक्षक नहीं है तभी तो सरकार आंदोलनरत शिक्षकों को बार बार बर्खास्त करने की धमकी दे रही है। बिहार सरकार को दिल्ली सरकार के शिक्षा क्षेत्र में किये गए सकारात्मक  कार्यों से  सबक लेकर वेतनमान एवम समान सेवा शर्त देने की अविलंब घोषणा करनी चाहिए लेकिन सरकार हठधर्मिता पर कायम है। झारखंड की भाजपा नीत सरकार ने भी शिक्षकों के ऊपर दमनचक्र चलाया था विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दल का क्या हाल हुआ,सर्वविदित है। चुनावी साल में सरकार को सचेत होने की जरूरत है। सरकार को तुरंत शिक्षक संगठनों से वार्ता कर चार लाख नियोजित शिक्षकों की मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेना चाहिए। शिक्षकों का भरोसा एवम विश्वास जीतना सरकार एवम व्यवस्था के हित में होगा।