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बेतिया(प.चं.) :: पं० विष्णु पाठक ने कथा के विश्राम दिवस पर गोविन्द के विवाह पर प्रकाश डाला
January 11, 2020 • aaditya prakash srivastava • आध्यात्म

शहाबुद्दीन अहमद, बेतिया, बिहार। प्रभु बांके बिहारी लाल की असीम अनुकम्पा के फलस्वरूप चम्पारण क्षेत्र के पुलिस उपमहानिरीक्षक श्री ललन मोहन प्रसाद जी एवं सभापति गरिमा देवी सिकारिया की उपस्थिति में हजारीमल धर्मशाला में आयोजित सप्ताह कथा यज्ञ की कथा की शुरुवात हुई I कोलकाता से पधारे युवा भागवत प्रवक्ता कृष्णानुरागी पं० विष्णु पाठक ने कथा के विश्राम दिवस पर गोविन्द के विवाहों पर प्रकाश डाला। कथा व्यास नें कहा कि जो प्रकृति के वश में है वह जीव है एवं प्रकृति जिसके वश में है वह ईश्वर है। सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए पं० पाठक नें कहा कि सुदामा कोई भिखमंगा ब्राह्मण नहीं था, बल्कि वह तो वो सुन्दर पुरोधा तेजस्वी संत था जिसके दामन को देखकर गोविन्द भी उनको कुछ देने का साहस नहीं कर सकें। सुदामा वह तेजस्वी महापुरुष था, जिसके चरणामृत ने पूरी द्वारका को शुद्ध किया। सुदामा वह प्रतापी महात्मा था जिसके चरणों को गोविन्द प्रभु नें धोया है। सुदामा वह सन्त प्रवर था, जिसको श्री कृष्ण नें बैठने के लिये अपना सिंहासन व शयन के लिए अपना शयन कक्ष प्रदान किया।

सुदामा जी की झांकी का पूजन नप सभापति गरिमा देवी सिकारिया, गोविन्द कुमार सिकारिया, प्रेमा देवी सिकारिया, किशोरी लाल सिकारिया, मयूर सिकारिया, राजेश सिकारिया, वृद्धि सिकारिया, प्रकाश सिकारिया, विक्की सिकारिया, आशीष शर्मा, डॉ अमिताभ चौधरी, डॉ दीपक जायसवाल, मत्स्य पदादिकारी मनीष श्रीवास्तव ने किया। श्रोताओं से भरपूर सभागार में पं० नें 24 गुरुओं का वर्णन करते हुए कहा कि गुरु बनाने का आधार गुरु जी का बंगला मोटर आश्रम नहीं बल्कि गुरु जी का ज्ञान व सरल जीवन होना चाहिए। पं० पाठक ने स्थानीय प्रशासन का धन्यवाद दिया। नगर परिषद् सभापति गरिमा देवी सिकारिया का धन्यवाद दिया, जिसका आगमन कथागार में नित्य प्रति रहा। न्यायाधीशों को विशेष आशीष प्रदान किया। साथ ही साथ सभी अतिथियों का धन्यवाद दिया। पं० पाठक नें विशेष तौर पर स्थानीय प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रोनिक मीडिया का धन्यवाद दिया, जिनके कारण क्षेत्र वासियों को यज्ञ की सुचना नित्य प्रति मिलती रही। आज के कथा की मुख्य बातें सुदामा वह जिसका दामन सुंदर, सुदामा वह जिसको देने का साहस प्रभु भी ना कर सकें। जिससे शिक्षा मिले वह शिक्षा-गुरु। गुरु बनाते समय गुरु के बंगले, आश्रम, मोटर गाड़ियों पर नहीं उनके ज्ञान व अतीत का अवलोकन जरुरी है।