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बगहा(प.चं.) :: ग्रैंड रीयूनियन कार्यक्रम के माध्यम से किया गुरुओं का सम्मान, गुरु भक्त आरुणि और अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित द्रोणाचार्य शिष्य अर्जुन की याद को तजा किया 2008 का बैच
January 13, 2020 • aaditya prakash srivastava • आध्यात्म

विजय कुमार शर्मा, बिहार, बगहा(प.चं.)। गुरु -शिष्य के बीच पवित्र संबंध सृष्टि के सृजन से ही चलता आ रहा है। अपने गुरु के प्रति असीम श्रद्धा और प्रेम की परंपरा भी आदि काल से सबसे अनूठी रही है ।आदि काल से अपने गुरु के लिए अपना सर्वस्व त्याग देने के लिए समर्पित शिष्यों की गौरव गाथा से ग्रंथों और इतिहास के पन्ने भरा पड़े है ।एक बात और है कि आधुनिकता की चकाचौंध और शिक्षा का व्यवसायीकरण हो जाने में के बाद भी गुरु -शिष्य के बीच सेवा समर्पण परंपरा का समापन नहीं हुआ है।वास्तविकता तो यह है कि सच्चे शिष्य अपने गुरु को कभी भूलते ही नहीं।वर्तमान समय के व्यस्ततम क्षणों मे भी शिष्य- गुरु के प्रति श्रद्धा व आदर का भाव अक्षुण्ण रखते हैं।
इसका अनोखा उदाहरण वर्ष 2008 का इस बैच ने प्रस्तुत किया भागती दौड़ती जींदगी के 12 वर्ष के बाद भी अपने गुरु के प्रति असीम श्रद्धा प्रेम और आदर रखने वाले, उन्हें सम्मानित करने के लिए दूर-दूर से मात्र एक छोटी सी सूचना पाकर पहुंचते हैं। वे उन शिष्यों मे से हैं जो अपने गुरु के आदेश से पांचाल नरेश द्रुपद जैसे शक्तिशाली सम्राट को गुरु के चरणों में झुका देनेते हैं ।वर्ष 2008 में मैट्रिक करने कर बच्चे अपनी कमरतोड़ मेहनत के कारण केन्द्र सरकार और राज्य सरकार में आज सेवा दे रहे सहपाठियों को एकत्रित करने के लिए ग्रुप एडमिन का बिडा उठाया कुमारी अंकिता पाठक उर्फ पूजा पाठक और मेहताब ने। 2008 के अपने उन सभी अपने सहपाठियों को व्हाट्सएप और फेसबुक के माध्यम से ढुंढा और आज की तिथि को निर्धारित कर गुरु सम्मान समारोह का आयोजन किया। वे सारे व्यस्तता को छोड़कर ,अपनी छुट्टी का दरख्वास्त देकर अपने गुरु को सम्मानित करने व अपने सहपाठियों से रूबरू होने के लिए ग्रैंड रीयूनियन नाम से गेट टूगेदर का कार्यक्रम रखा।
फिर क्या था "जब इरादा पक्का हो तो मंजिल मिल ही जाता है "इस कथन को चरितार्थ करते हुए ,कोई मुंबई से तो कोई गुजरात से तो कोई सिवान से, दूरी के बावजूद भी अपने सपनों को मूर्त रूप देने के लिए हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर, बगहा की धरती पर अपने गुरु के सम्मान में पटखौली स्थित सनफ्लावर चिल्ड्रेंस एकेडमी के प्रांगण में उपस्थित हो गए। बस अब केवल इंतजार था तो अपने गुरुओं के पहुंचने की। जैसे ही इसकी सूचना अचानक मिली, गुरु भी अपने शिष्यों से मिलने के लिए अपने सारे कार्यों को छोड़कर पहुंच गए। पहले कैयूम सर ,फिर आब्बास सर और उसके बाद निप्पू सर आप बात सर अन्त मे अभिभावक श्री विजय पाठक जी मौजूद हुए ।बच्चों ने पहले अपने गुरुओं का स्वागत किया । गुरुओं द्वारा मोमबत्तियां जलाई गई ।उनके हाथों से केक कटवाया गया। तब बच्चों ने बारी-बारी से अपने गुरुओं को केक व मिठाईयां खिलाएं। उन्हें मिठाइयां खिलाएं। तदुपरांत विचारों का प्रकटन का सिलसिला शुरू हुआ और अन्त मे गुरु को अंग वस्त्र प्रदान किया। नई साल की डायरी और उपहार देकर गुरु का सत्कार किया। गुरुजनों व
अपने सहपाठी मित्रों के साथ भोजन करने के बाद कार्यक्रम का समापन हुआ। आदर को पाकर गुरु भी अपने छात्रों पर गौरव महसूस किए। इस अवसर पर 2008 बैच के सुधीर विनय ,डेविड ,प्रकाश आनंद ,रवि अमन ,अंकेश ,ममता, अंकिता, सारिका, मनीष जैसे छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाए धन्य है ऐसे गुरु और धन्य है ऐसे शिष्य जो आज भी गुरु शिष्य की परंपरा अनोखा मिसाल पेश करते हैं।